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लागोस में नाइजीरियाई इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का संबोधन (22 जनवरी, 2024)

जनवरी 22, 2024

इस कार्यक्रम के अध्यक्ष, नाइजीरिया के पूर्व विदेश मंत्री, प्रोफेसर बोलाजी अकिनेमी,
एनआईआईए के महानिदेशक, प्रोफेसर एघोसा ओसाघे,
योरूबालैंड के येये ओडुआ, एरेलु अबिओला दोसुनमु,
प्रोफेसर फेमी ओटुबैन्यो,
राजदूतों, गणमान्य अतिथिगणों,

आप सभी को दोपहर की नमस्कार, और आज आप सभी के साथ होना मेरे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात है।

इस मंच पर, इस संस्थान में आना और आप सभी से बात करने का अवसर प्राप्त करना मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है। पहली बात, क्योंकि यह नाइजीरिया का मेरा पहला दौरा है, और शायद ऐसा सार्वजनिक मंच जहां हम अपने संबंधों के बारे में बात करें, इसकी शुरूआत करने का सबसे अच्छा तरीका है। दूसरी बात यह कि एनआईआईए का भारत में एक ऐसी ही संस्था, जिसके साथ मेरा खुद का एक लंबा जुड़ाव था, इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स के साथ एक लंबा संबंध रहा है। और दो वर्ष पूर्व, प्रोफेसर ओसाघे, एक प्रतिष्ठित आगंतुक के रूप में आपका स्वागत करने का हमें सौभाग्य मिला था। और आज, यहां मेरी उपस्थिति से मुझे आशा है कि दोनों संस्थानों के बीच संबंधों को और आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

अब, जैसा कि आपको पता है, भारत और नाइजीरिया के बीच का हमारा आपसी संबंध, नाइजीरिया की स्वतंत्रता से भी पहले से रहा है। हमारी राजनयिक उपस्थिति 1958 में लागोस में स्थापित की गई थी। और उससे भी पहले, कई पीढ़ियों से नाइजीरिया के नागरिक भारतीय शिक्षकों से परिचित रहे हैं, भारतीय व्यापारियों से परिचित रहे हैं, यहां औपचारिक राजनयिक से भी पहले ही जिनका भारत से जुड़ाव रहा। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात, इस संबंध के अन्य तरीके और अन्य आयाम भी रहे। जैसे-जैसे हम अपने राष्ट्र निर्माण के लिए आगे बढ़े, हमारी सेनाओं ने सहयोग किया। कदुना में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी हमारे सैन्य सहयोग का प्रतीक है, जैसे कि पोर्ट हरकोर्ट में नौसेना युद्ध कॉलेज नौसेना के क्षेत्र में हमारे सहयोग का एक उदाहरण है। और पिछले दशकों में, हमारे बीच वास्तव में आपसी संबंधों में बहुत उतार-चढ़ाव आया है। मैंने स्वयं...मुझे पता चला है कि मेरे ऐसे अनेक मित्र हैं जिन्होंने विभिन्न पदों पर यहां समय बिताया है। और वास्तव में, कई मायनों में, हम नाइजीरिया को अपने अंतरराष्ट्रीय तकनीकी और शिक्षा सहयोग कार्यक्रम के उदाहरण के रूप में देखते हैं, क्योंकि उस कार्यक्रम के पूर्व विद्यार्थियों ने बीते वर्षों में वास्तव में इस संबंध को बहुत गौरवान्वित किया है।

अब, जैसे-जैसे विश्व अधिक वैश्वीकृत होता गया, इस संबंध के अन्य आयाम भी विकसित हुए, जिनमें से कुछ अतीत पर आधारित थे, तो कुछ नवीनता को प्रतिबिंबित करते हैं। और उनमें से एक आज भारतीय समुदाय की उपस्थिति है, मेरा मानना है कि लगभग 60,000 लोग, जो हमारे दोनों देशों के बीच जीवंत संपर्क सेतु हैं, जो कई तरीकों से इन संबंधों में योगदान करते हैं, और जो यह सुनिश्चित करते हैं कि चाहे राजनीति परिदृश्य बदलते रहें, आर्थिक परिवर्तन होते रहें, लेकिन हमारे दोनों समाजों के बीच संबंध मजबूत बना रहे, स्थिर बना रहे। अब, पिछले कुछ वर्षों में, न केवल उन्होंने, बल्कि अन्य व्यक्तियों ने भी, आर्थिक संबंधों को बहुत मजबूत बनाने में सहायता की है। मेरे विचार में, आज इस देश में हमारी लगभग 30 अरब डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता है। हमारा वार्षिक व्यापार 12 से 15 अरब डॉलर के बीच रहता है। और इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारे बीच एक ऐसा संबंध है जिसे हम रणनीतिक साझेदारी के रूप में मानते हैं।

अब, मेरे पहले दौरे के पहले पड़ाव के रूप में यह सब कहते हु, मेरे विचार में मेरे लिए यह समझना ज़रूरी है कि इस संबंध में कितनी प्रगति हुई है। लेकिन मुझे यहां वैश्विक एजेंडे और ग्लोबल साउथ पर बात करनी है। तो अब मैं विषयांतर करता हूँ। यह रोचक बात है कि मैं कंपाला में गुटनिरपेक्ष बैठक से यहां आ रहा हूँ। और मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जहां माननीय प्रोफेसर और पूर्व विदेश मंत्री ने हमारे बीच गुटनिरपेक्ष संबंधों का उल्लेख किया है, वहीं आज यह ग्लोबल साउथ और वैश्विक एजेंडा दोनों को परिलक्षित करता है। अभी हाल ही में भारत ने जी20 की अध्यक्षता सफलतापूर्वक संपन्‍न की है, जिसमें हमने स्थायी आधार पर अफ्रीकी संघ का विस्तार और पहली बार सदस्यता में प्रवेश देखा। और यह बताते हुए मुझे गर्व है कि यह एक ऐसी पहल थी जिसका नेतृत्व हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से किया था। जी20 के दौरान न केवल जी20 में, बल्कि वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ समिट में भी नाइजीरिया की भागीदारी हमारे लिए बहुत सम्मान की बात रही, जो मुख्य समिट से पहले और पश्चात हुआ था।

अब, मैं गुटनिरपेक्ष सम्मेलन की बात कर रहा हूँ, मैं जी20 की बात कर रहा हूँ, क्योंकि कई मायनों में, ये वर्तमान में जारी वैश्विक वार्ताओं के हाल के सबसे समसामयिक उदाहरण हैं। और यह वैश्विक वार्तालाप, वास्तव में ग्लोबल साउथ की उन्नति पर केंद्रित है, क्योंकि ग्लोबल साउथ की उन्नति के बिना, हम वैश्विक प्रगति नहीं कर सकते। लेकिन यह वैश्विक वार्तालाप, अपनी प्रकृति में लगातार विपथित होता रहा है। कोई संकट आता है, कोई बड़ी घटना घटती है, कोई अन्य एजेंडा सामने आता है और फिर वैश्विक वार्तालाप लड़खड़ा जाती है। यह पटरी से उतर जाता है। जो प्राथमिकताएं हैं, उन पर ध्यान केंद्रित करना बंद कर दिया जाता है। तो जी20 की हमारे द्वारा अध्यक्षता की यह एक बड़ी उपलब्धि कि एक बहुत ही ध्रुवीकृत, अत्यधिक विभाजित विश्व के अनुभवों के पश्चात, मैं कहना चाहूँगा, कि एक विशेष क्षेत्र पर केंद्रित था, लेकिन हम जी20 पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम थे। हम विश्व का ध्यान इस पर केंद्रित करने में सक्षम थे। हम फिर से उन मुद्दों पर ग्लोबल साउथ का ध्यान केंद्रित सक्षम रहे जो आज वास्तव में महत्त्वपूर्ण हैं। और वे मुद्दे सतत विकास लक्ष्यों से, स्वच्छ और हरित विकास से, महिला नेतृत्व वाले विकास से, स्वास्थ्य, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा से, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से, और वास्तव में, हमारे जीवन की विधियों से और हमारी पृथ्वी के भविष्य से जुड़े हैं, और यह तथ्य है कि पृथ्वी के अधिकांश भागों की वृद्धि को, पृथ्वी-संरक्षण के तर्कों के सापेक्ष आलोचित नहीं किया जाना चाहिए। ये दोनों ही तभी संभव हैं जब हम अपनी नीतियां सही ढंग से तैयार करें।

अब, जैसा कि मैंने आज कहा, वास्तविक वैश्विक एजेंडा क्या है, यह बहस का एक बड़ा भाग है? मैंने आपको कुछ उदाहरण दिये। और ये उदाहरण वास्तव में एक निश्चित दिशा की ओर इंगित करते हैं। ये हमें स्पष्ट रूप से प्रगति की दिशा में इंगित करते हैं, जहां प्रत्येक समाज, जिस प्रकार से वह स्वयं सहज रह सके, आगे बढ़ने में सक्षम हो सके, जहां समृद्धि कुछ व्यक्तियों का विशेषाधिकार न हो, बल्कि जहां वृद्धि निरंतर और स्थायी हो, टिकाऊ हो, पर्यावरण-अनुकूलता हो, जहां सुरक्षा हो, जहां स्थिरता हो, और जहां, जैसा कि मैंने कहा, भोजन, स्वास्थ्य, और ऊर्जा की बुनियादी जरूरतें पूरी होती हो, जहां जलवायु न्याय के साथ जलवायु कार्यवाही को आगे बढ़ाया जाए और जहां विश्व का ध्यान समुचित रूप में एजेंडा 2030 पर केंद्रित बना रहे।

और मैं कहना चाहूँगा कि, वास्तव में हमारे द्वारा की गई जी20 की अध्यक्षता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन तब हुआ जब मैं सितंबर के अंत में न्यूयॉर्क गया था और मैंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से यह सराहना सुनी कि एक बार फिर से सही मुद्दों पर बातचीत हुई। एसडीजी समिट, आगामी समिट, जो इस वर्ष के अंत में होगा, इसमें हमारे विश्व के अधिकांश नागरिकों की चिंताओं को उठाया जाएगा। और उनसे इसका सरोकार है चाहे हम देश में अपनी घरेलू नीतियों के बारे में बात करें या चाहे आज हम विदेश में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बहस करें। यह दृढ़ विश्वास, वैश्विक अभिशासन, वैश्विक वार्ताएं, वैश्विक बहस को निर्देशित करने वाला सरल सिद्धांत है कि सबको साथ लेकर चलना होगा और कोई भी पीछे नहीं छूटना चाहिए। और जब हम किसी के भी पीछे न छूट जाने की बात करते हैं, तो मेरे विचार में अफ्रीका का कल्याण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वास्तव में, मैं कहना चाहूँगा कि अफ्रीका का विकास और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बदलती वैश्विक व्यवस्था में, हमने औपनिवेशिक व्यवस्‍था से महाद्वीपों के स्वतंत्र होने के पश्चात उनका विकास होता देखा है। समय के साथ इस विकास ने एक पुनर्संतुलन, एक राजनीतिक पुनर्संतुलन और एक आर्थिक पुनर्संतुलन उत्पन्न किया। और वह पुनर्संतुलन अब एक बहु-ध्रुवीय प्रकृति वाले विश्व का निर्माण कर रहा है, जहां, जैसा कि महामहिम ने कहा, मध्य शक्तियों की, और शायद अन्य क्षेत्रीय संगठनों की भी इस विश्व को आगे बढ़ाने के तरीके तय करने में निष्पक्ष और अधिक न्यायसंगत भागीदारी होगी। इसलिए आज का वैश्विक एजेंडा कई मायनों में विश्व को उसकी प्राकृतिक विविधता के साथ बहाल करने के बारे में है। क्योंकि विश्व पहले भी विविधतापूर्ण था, विश्व आज भी विविधतापूर्ण है, पश्चिमी प्रभुत्व के दौर में यह विकृत हुआ था। और आज उपनिवेशवाद के दौर के बाद वाले विश्व में, उस प्राकृतिक विविधता को बहाल करना वास्तव में हमारा सामूहिक उद्देश्य है।

अब, उस प्रक्रिया में क्या चुनौतियाँ हैं? निःसंदेह, एक बात तो यह कि हममें से अधिकांश ने स्वतंत्रता प्राप्त की, और हम सबने अपने राष्ट्रों और समाजों का निर्माण किया। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि पुराना वर्चस्व छूट नहीं रहा है। लेकिन अलग-अलग तरीकों से, यह 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत का साम्राज्यवाद नहीं हो सकता है, लेकिन अलग-अलग तरीकों से, आज भी, जिन लोगों ने पिछले 200 से 300 वर्षों तक विश्व पर प्रभुत्व कायम रखा, उनमें से कई नए उपायों के साथ, नए नियमों के साथ और विभिन्न तकनीकों के साथ यह बनाए रखना चाहते हैं। और हम किस तरह से उनका सामना करेंगे, हम उस पर कैसे काबू पाएंगे, हम विश्व का एक न्यायपूर्ण जगह बनना कैसे सुनिश्चित करेंगे, यह पहली चुनौती है।

दूसरी चुनौती अभी ज्यादा पुरानी नहीं है। हम पिछले तीन दशकों से वैश्वीकरण के बारे में बात कर रहे हैं। वैश्वीकरण परिवर्तनकारी रहा है। कुछ लोगों का तर्क है कि वैश्वीकरण सदैव से था, लोग सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान तक आवागमन करते थे। यह सही है। आख़िरकार, लोग अफ़्रीका से विश्व के अन्य भागों में गए, इस तरह विश्व में आवागमन हुआ। लेकिन आज वैश्वीकरण का एक बहुत ही विशिष्ट अर्थ है। यह अर्थशास्त्र का, अन्योन्याश्रितता का, पारस्परिक प्रवेश्यता का, प्रौद्योगिकी पर साझा निर्भरता का, एक स्तर की गतिशीलता का संयोजन है जिसे हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया था।

अब, जबकि वैश्वीकरण के कई सकारात्मक परिणाम हुए हैं, इसने निर्विवाद रूप से बहुत गहन आर्थिक एकत्रीकरणों को भी उत्पन्न किया है। आज विश्व का अधिकांश भाग कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में होने वाले उत्पादन पर निर्भर है। अब, यह व्यवस्था उपयोगी बनी रही जब तक हमारा यह विश्वास बना रहा कि पूरे विश्व को उसी तरीके से चलाया जा सकता है जिस तरह से नागोया में जापानी कारों का निर्माण किया जाता है, कि नियमित आवश्यकताएं पूरी करने के लिए सब कुछ समय पर आता रहेगा। हम ग़लत थे, लेकिन हमें यह पता नहीं था। और फिर कोविड का दौर आया। और कोविड ने हम सबके सामने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारे जीवन की सबसे बुनियादी चीजों के मामले में, हम अक्सर दूर-दराज के आपूर्तिकर्ताओं और उत्पादकों पर निर्भर थे। न केवल उन पर निर्भर थे, जैसा कि हमें कोविड के दौरान पता चला, बल्कि एक अर्थ में हम उनके बंधक थे। हममें से कई लोग मास्क और दस्ताने और पीपीई और वेंटिलेटर और बुनियादी दवाओं और टीकों को लेकर संघर्ष करते रहे। हमने भोजन के लिए संघर्ष किया। इसलिए, कोविड के अनुभव की एक बड़ी सीख यह है कि आज हमारे विश्व को अत्यधिक केंद्रीकरण के जोखिम से मुक्त होना होगा। यदि आप एक अधिक संतुलित विश्व, एक अधिक लोकतांत्रिक विश्व के बारे में बात करते हैं, तो लोकतांत्रिक होने का अर्थ केवल राजनीतिक रूप से लोकतांत्रिक होना नहीं है। यह केवल विभिन्न राष्ट्रों के अधिकार का मामला नहीं है। लोकतांत्रिक होने का अर्थ यह भी है कि हर क्षेत्र को, कभी-कभी हर बड़े देश को अपने उत्पादन के मूल आधार अपने नियंत्रण में रखने होंगे, ताकि वह आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित रह सके। यह हमारी दूसरी प्रमुख चुनौती है।

अब हम अगर तीसरी चुनौती पर बात करें, तो वह, निश्चित रूप से, विचारधाराएं स्थापित करने के बारे में है। और मैंने पुराने प्रभुत्व के बारे में बात की। पुराना वर्चस्व आपको आज यह नहीं बताता कि एक डंडे से आपको क्या करना है। पुराना प्रभुत्व आपको सोशल मीडिया के माध्यम से, सामान्य मीडिया के माध्यम से बताएगा कि मानक स्थापित करने के लिए राजनीतिक रूप से सही क्या है। और विचारधाराओं की यह स्थापना, वास्तव में आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बहुत शक्तिशाली पहलू है। यहां सोच है, विचारधाराएं हैं, शासन व्यवस्थाएं हैं जिनका उदय होता है, जिन्हें गिराया जाता है, अप्रासंगिक बना दिया जाता है, और विचारधाराओं की स्थापना द्वारा केंद्र में लाया जाता है।

निस्संदेह, इस सबके बीच, विश्व के ध्रुवीकरण की चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। हम भारत में इसे विशेष रूप से दृढ़ता से, और हाल ही में जानते हैं क्योंकि हमने जी20 की अध्यक्षता के दौरान इसका सामना किया। यूक्रेन जैसे संघर्षों ने पूर्व और पश्चिम को ध्रुवीकृत कर दिया है। विकास संबंधी मुद्दों ने उत्तर और दक्षिण को ध्रुवीकृत कर दिया है। तो, आज हम वैश्विक एजेंडे की बात कैसे कर सकते हैं जब विश्व ही इतना अधिक विभाजित है? यह अपने-आप में एक बड़ी चुनौती है। निस्संदेह, पारंपरिक, मुद्दे मौजूद हैं जिन्हें वैश्विक मुद्दे कहा जाता है। ये ऐसी चुनौतियाँ हैं जो हर देश के लिए ख़तरा हैं लेकिन सीमाओं के सिमट सकने वाली चुनौतियों से ये कहीं ज़्यादा बड़ी हैं। तो, यह आतंकवाद हो सकता है, जो कि मेरे विचार में एक बड़ी चुनौती है, जिसका कि नाइजीरिया को अपने तरीके से अनुभव करना होगा जिस तरह से हमें एक अलग तरीके से अनुभव करना पड़ा। या सामुद्रिक सुरक्षा, सामुद्रिक डकैतियां, और जलवायु घटनाओं की चुनौतियाँ, जिन्हें हम अधिक से अधिक बार देख रहे हैं। इसलिए, अगर हमें वास्तव में वैश्विक एजेंडे के साथ चलना है तो ये कुछ चुनौतियाँ हैं जिन पर हमें काबू पाना होगा। कुछ, जैसा कि मैंने कहा इनमें से कुछ पारंपरिक हैं, कुछ विकसित हुई हैं और कुछ अभी हाल की ही हैं।

वैश्वीकरण और केंद्रीकरण पर बात करते हुए, उससे एक भिन्न चुनौती उभर कर सामने आती है, कि कैसे वैश्वीकरण को ही एक हथियार बना दिया गया है। कि आज मुद्रा भी एक हथियार बन गई है। व्यापार एक हथियार बन गया है। पर्यटन एक हथियार बन गया है। इसमें प्रभुत्वशाली पक्ष, निर्माता के रूप में प्रभावशाली हो सकते हैं। वे उपभोक्ता के रूप में प्रभावशाली हो सकते हैं। निस्संकोच कहा जा सकता है कि वे प्राय: अपने विशेष राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए वैश्विक प्रणाली में अपनी बाजार हिस्सेदारी का लाभ उठाते हैं। और निःसंदेह, इस सब के पीछे अंतर्निहित एक चुनौती भी है, चूंकि यह अंतरराष्ट्रीय मामलों पर कार्य वाली संस्था है, जिसे हम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, जो कि एक वैश्विक व्यवस्था है जिसे 1945 में बनाया गया था, जब संयुक्त राष्ट्र के सदस्य मोटे तौर पर आज का 25% थे। और वह वैश्विक व्यवस्था हठपूर्वक जारी है, क्योंकि जो लोग कर्ताधर्ता बने बैठे हैं वे उस दायरे में अन्य पक्षों के लिए गुंजाइश नहीं बनाना चाहते। तो, ये वास्तव में वैश्विक एजेंडा की चुनौतियां हैं जो विभिन्न प्रकार से उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के रास्ते की बाधाएं हैं जो हम सभी ने वास्तव में, परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से, अपने उद्देश्यों के रूप में निर्धारित किए हैं।

अब इस विषय में और अन्यथा भी, मेरे विचार से आप सभी इससे अवगत होंगे कि हमने ग्लोबल साउथ शब्द का उपयोग अधिक बार, अधिक जोर से, मैं कहना चाहूँगा कि अधिक प्रभावी ढंग से करना शुरू कर दिया है। और जैसा कि आप जानते हैं कि इसका प्रभाव तब स्पष्ट होता है जब कोई उद्योग यह सवाल उठाता है कि ग्लोबल साउथ जैसा कुछ है, लोग कॉलम लिखते हैं और कहते हैं, कि क्या आपको पता है कि ग्लोबल साउथ क्या है? इसका कोई अर्थ नहीं है, जैसा कि आपको पता है, वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसलिए, आप जो कर रहे हैं उसका जब लोग विरोध शुरू कर देते हैं, तो आपको पता चल जाता है कि यह काम कर रहा है। तो, ग्लोबल साउथ क्या है? क्योंकि यह प्रश्न हम सभी से पूछा जाता है, विशेषकर उनसे जो ग्लोबल साउथ नहीं हैं। क्योंकि याद रखें, यदि आप ग्लोबल साउथ से हैं, तो आपको इसे समझने में कोई समस्या नहीं होगी। यह स्वाभाविक है। इसलिए, मैं कहना चाहूँगा कि ग्लोबल साउथ, सर्वप्रमुख रूप से, एक मानसिकता है। इसे जो समझते हैं, यह उनके लिए है। जो इसे नहीं समझते, उनके लिए यह कभी नहीं है। लेकिन यह ऐसी मानसिकता है जिसके कुछ बुनियादी सिद्धांत हैं। ये सिद्धांत हमारी आदतों से, हमारी राजनीतिक संस्कृति से, जिस तरह से हमने पिछले 60, 70, 80 वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर कार्य किया है उसके आधार पर बने हैं। उदाहरण के लिए, अ-हस्तक्षेप, उदाहरण के लिए, अ-हस्तक्षेप या पूर्वाग्रहरहित या दुरभिसंधि रहित होना। लेकिन मैंने आपको चार नकारात्मक विशेषण बताए हैं, इसलिए अब मैं आपको एक सकारात्मक परिभाषा देता हूँ।

ग्लोबल साउथ अंततः एकजुटता के बारे में है। ग्लोबल साउथ का अर्थ है उदारता। ग्लोबल साउथ का अर्थ है साझा करने के लिए तत्परता । तो जब लोग कहते हैं, जैसा कि आप जानते हैं, कि मुझे बताएं कि यह ग्लोबल साउथ कैसे काम करता है? मैं उन्हें अपने अनुभव से एक उदाहरण देता हूँ। मैं उनसे कहता हूँ, देखिए, मेरे देश में हम जब अपने नागरिकों का टीकाकरण कर रहे थे तभी हमने विश्व के 100 देशों को टीके की आपूर्ति शुरू कर दी थी। और मैं इसकी तुलना ग्लोबल नॉर्थ से करता हूँ, जहां ऐसे देश मौजूद हैं जो अपनी आबादी से आठ गुना अधिक संख्या में टीके चाहते हैं और वे इसे अपने पास के किसी छोटे से द्वीप को भी नहीं देंगे। मेरे लिए ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ के बीच यही अंतर है।

तो, ग्लोबल साउथ आज ग्लोबल नॉर्थ के साथ, वैश्विक एजेंडे पर किस तरह कार्य करता है? मेरे विचार में कई मायनों में स्पष्ट रूप से सहानुभूतिपूर्ण होने से, समस्याओं को समझने से, सम्मानजनक होने से इसका अर्थ है, यह पहचानने से कि हर देश की अपनी संप्रभुता होती है, कि हर देश की अपनी संस्कृति होती है, कि हर देश की अपनी परंपरा होती है और समाधान इस तरह से खोजा जाना चाहिए कि वह थोपा गया प्रतीत नहीं होता हो, कि वह मूल रूप से उस समाज के अपने स्वामित्व में हो जो वास्तव में उस समाधान को लागू करने जा रहा हो। और मैं आज यह भी कहना चाहूँगा कि इसका एक महत्वपूर्ण भाग राजनीति से परे है, अर्थशास्त्र से परे है, प्रौद्योगिकी से परे है, हमें यह भी याद रखना होगा कि हम कौन हैं और अपनी संस्कृति, परंपराओं, विरासत को ध्यान में रखना होगा क्योंकि ये हमारे डीएनए में शामिल हैं। हम लोग, कुछ समाधानों और कुछ तरीकों को लेकर अधिक सहज हैं क्योंकि वह हमारी संस्कृति के अंग है। इसलिए, मैं ग्लोबल साउथ को और ग्लोबल साउथ के काम करने के तरीके को राजनीतिक विचार, आर्थिक साझेदारी, प्रौद्योगिकी प्रसार, और इसके साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता के संयोजन के रूप में परिभाषित करूंगा।

तो, इस सब बातों के साथ, चूंकि शीर्षक 'ग्लोबल एजेंडा, भारत और ग्लोबल साउथ' था। तो, भारत क्या कर सकता है? ग्लोबल साउथ के लिए एक अर्थ में भारत, ग्लोबल साउथ के साथ क्या कर सकता है? और एक तरह से मैंने उस बात का उत्तर दिया जो प्रोफेसर अकिनेमी ने कही थी, कि, उन्होंने कहा था कि विश्व जितना अधिक बदलता है, उतना ही अधिक वह समान भी रहता है। शायद ऐसा हो सकता है। लेकिन मैं आपसे कहना चाहूँगा कि भारत में क्या बदलाव आया है। वास्तव में उन्होंने स्वयं हमें एक उदाहरण दिया, चंद्रमा पर लैंडिंग। मैं आपके सामने एक और तथ्य रखता हूँ कि हम इतने बड़े पैमाने पर टीके का उत्पादन कर सके, न केवल अपनी जरूरतों के लिए बल्कि बड़े पैमाने पर विश्व के लिए भी। न केवल टीकों का उत्पादन किया, बल्कि टीकों का आविष्कार भी किया। या अगर कोई आज प्रौद्योगिकी को देखता है, तो इसमें तथ्य यह है कि दूरसंचार में 5जी स्टैक है, जब डिजिटल बुनियादी ढांचे की बात आती है तो इंडिया स्टैक है। तथ्य यह है कि आज खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण लेकिन बुनियादी मुद्दे के मामले में, हम सचमुच अपनी परंपराओं का फिर से अन्वेषण कर रहे हैं और मिलेट्स को प्रोत्साहन दे रहे हैं, क्योंकि मिलेट्स हमारी परंपरा का अभिन्न अंग रहे हैं और जिसे हम सभी ने उपेक्षित करके न केवल स्वयं का, बल्कि एक अर्थ में पृथ्वी का नुकसान किया है। तो, प्रश्न यह है कि क्या परिवर्तन हुआ है? मैं आज पूरी निष्पक्षता से कहना चाहूँगा कि इसमें भारत अधिक योगदान कर सकता है और कर भी रहा है। भारत कई मायनों में परिवर्तन का, प्रगति का प्रदर्शक या प्रयोगशाला या अनुप्रयोग है। और क्योंकि क्षमताएं बढ़ी हैं, क्षमताएं बढ़ी हैं, लेकिन आकांक्षाएं सदैव बनी रही हैं। आज साझा करने की हमारी क्षमता बढ़ी है।

तो, आइए मैं आपसे कुछ व्यावहारिक तरीकों के बारे में बात करूं, क्योंकि यह कहना भी महत्त्वपूर्ण है, कि हां हम ग्लोबल साउथ हैं, हमें साझा करना चाहिए, हमें अच्छा करना चाहिए, हमें एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए। ठीक है, ये अच्छी बातें हैं। वास्तव में, इसका क्या अर्थ है? मैं आपको सात या आठ उदाहरण दूँगा। एक तो मैं कहना चाहूँगा कि ग्लोबल साउथ के संबंध में, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के मामले में भारत वास्तव में बदलाव ला सकता है। पिछले दशक में भारत में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है, और विश्वास करें, आपको यह देखने के लिए भारत आना चाहिए कि यह वास्तव में एक क्रांति की तरह घटित हुआ है, यह तथ्य है कि हमने एक डिजिटल आधार बनाया है और आज उस डिजिटल आधार पर, नागरिकों को इस व्यापकता, दक्षता और ईमानदारी के साथ कार्यक्रम और लाभ प्रदान किए जा रहे हैं जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी; जहां वास्तव में दो-तिहाई आबादी को बीच में किसी हिस्सेबांट के बिना भोजन मिल सकता है, जहां आबादी के एक तिहाई हिस्से को बिना किसी तरह के कमीशन के ऋण दिया जा सकता है, जहां नागरिकों को वास्तव में स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता होने पर वे अपनी पात्रता दिखा सकते हैं और ये सुविधाएं नि:शुक प्राप्त कर सकते हैं या सब्सिडी वाली स्वास्थ्य सेवाएं ले सकते हैं, जहां आज 200 मिलियन व्यक्तियों को, वास्तव में पिछले दशक में 2014 के पश्चात से 200 मिलियन व्यक्तियों को नए घर प्रदान किए गए हैं। तो, एक बार जब आप एक अभिशासन प्रणाली के रूप में डिजिटल प्रणाली का लाभ उठाते हैं तो इतने व्यापक परिणाम प्राप्त होते हैं जिनके बारे में हमारा मानना है कि यह ग्लोबल साउथ के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान हो सकते हैं और स्पष्ट तौर पर इसमें हम एक प्रौद्योगिकी भागीदार और समर्थक बनने की इच्छाशक्ति से सुसज्जित हैं।

मैंने टीकों के बारे में बात की, लेकिन कोविड के बाद भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दूर नहीं हुईं, और यदि आप देखें तो पूरे विश्व में एक सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं की लागतों की है, जिसका देशों को सामना करना पड़ता है। यह केवल विकासशील देशों के साथ नहीं है, विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बहुत बड़ी समस्या है, वहां भी बहुत से लोग इसके खर्च वहन नहीं कर सकते, लागतें अधिक होने के कारण उनके नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं के लाभ नहीं मिल पाते हैं। आज, हमने फिर से, 1.4 अरब नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कम लागत वाली एक दवा प्रणाली बनाने का प्रयास किया है जो मुख्य रूप से जेनेरिक पर आधारित है जहां थोक खरीद के माध्यम से, इसे बड़े पैमाने पर सुलभ बनाकर, हम लागत को काफी कम करने में सक्षम होंगे। इन्हें जनता के दवाखाने कहा जाता है, और यह वास्तव में, मैं कहना चाहूँगा, यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, इन्वेंट्री प्रबंधन और उन कमजोर व्यक्तियों के कल्याण की भावना का एक अच्छा उदाहरण है, जो अन्यथा दवाओं का खर्च नहीं उठा सकते हैं।

हमने अंतरिक्ष के बारे में बात की। चंद्रमा पर लैंडिंग एक कामयाबी थी। लेकिन फिर भी, अंतरिक्ष एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विकास की बहुत सारी संभावनाएं हैं। वह अंतरिक्ष से, और जैसा कि आप जानते हैं, यह अंतरिक्ष हो सकता है, लेकिन फिर... मैं बहुत निचली कक्षा की तकनीक, ड्रोन की बात करता हूँ, आज ड्रोन का उपयोग, अंतरिक्ष संपत्तियों का उपयोग, हमारे दैनिक जीवन पर एक अन्य जबरदस्त प्रभाव डाल रहा है। या जैसा कि आप जानते हैं, वह सपोर्ट जो हम एक दूसरे को देते हैं। ग्लोबल साउथ बंधुता के अंतर्गत, भारत ने आज विश्व भर के 78 देशों में 600 परियोजनाओं को क्रियान्वित किया है।

मैं इन सबका उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि एकजुटता के बारे में बोलना, सहयोग का उल्लेख करना एक बात है, और हम सभी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति को लेकर जमीन से जुड़े हैं। और हम सभी सच्ची भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। लेकिन परिवर्तन उस क्षमता में हुआ है, जो आज उन भावनाओं को व्यावहारिक गतिविधि में, संपत्ति में, समाधान में बदल सकती है, यह कि ग्लोबल साउथ के एक बड़े भाग तक, निश्चित रूप से मैं कहना चाहूँगा कि शायद अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट तक, हम आज प्रतिक्रिया करने वालों में प्रथम हैं। यदि कुछ होता है, तो अधिक संभावना यह है कि आप भारतीय बलों को वहां सबसे पहले जाते हुए देखेंगे।

तो मेरे लिए, ग्लोबल साउथ वास्तव में एक आंदोलन है जिसकी प्रेरणा, जिसकी भावना, जिसकी प्रतिबद्धता को बहुत ही व्यावहारिक तरीकों से विश्व कल्याण के लिए उपयोग करने की आवश्यकता है। और मैं निश्चित रूप से आशा करता हूँ कि इस तरह से, मौजूदा निकायों के माध्यम से, जी20 जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से, वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ समिट जैसी प्रक्रिया के माध्यम से, साउथ-साउथ सहयोग के माध्यम से, द्विपक्षीय संबंधों के माध्यम से, हम ऐसे उपाय खोज सकते हैं जिनके द्वारा हम अनुभव साझा कर सकें, जहां हम एक-दूसरे को सशक्त बना सकें, और ऐसा करते हुए कई मायनों में हम वास्तव में अपनी क्षमताओं के पूरक होते हैं। उन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मैं यहां आया हूँ। मैं अपने समकक्षों के साथ चर्चा करने के लिए कल अबुजा जाऊंगा कि हमारे संयुक्त आयोग के माध्यम से इन व्यावहारिक चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जाए। लेकिन आज मैं वास्तव में बहुत आभारी हूँ कि आपने मुझे इन भावनाओं को आप सभी के साथ साझा करने का अवसर प्रदान किया। मुझे यहां आमंत्रित करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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